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झील में आतंक | Krishna and Kaliya Naag story in Hindi

Krishna and Kaliya Naag Story: Krishna on Kaliya Naag | Sri Krishna Janmastmi 2020 Special Part 6

Krishna and Kaliya Naag Story:  नमस्कार दोस्तों, अगर आपने इस सीरीज कृष्ण जन्माष्टमी स्पेशल 2020 का भाग 1-श्री कृष्णा जन्म लीला , भाग 2- गुप्त बदलाव, भाग 3- पूतना वध , भाग 4- भगवान श्री कृष्णा द्वारा कुबेर पुत्रों को नारद मुनि के शाप से मुक्ति और भाग 5- माखन चोरी लीला नहीं पढ़ा है तो पहले वह अवश्य पढ़ें| दोस्तों चलिए पढ़ते है, श्री कृष्ण और कालिया नाग की कहानी को...

कालिंदी झील का जहर

यमुना नदी के मोड़ से लगी हुई 'कालिंदी' नामक एक झील थी| वह जिस स्थान पर थी, वह स्थान बहुत ही लुभावना था, हरे-भरे चरागाह और बगीचे उससे लगे हुए थे| उसके किनारों पर लगे हुए बड़े-बड़े पुराने वृक्ष उस पर अपनी शाखाएँ फैलाए हुए थे, परन्तु एक बहुत विचित्र बात थी कि एक भी चिड़िया वहाँ नहीं चहचहाती थी| यहाँ तक कि खाली घोंसले भी हवा के तेज बहाव से भी वर्षों पहले उड़ गए थे|

एक बार प्रवासी चिड़ियों का झुंड यहाँ आकर पेड़ों पर रहने के लिए स्थान खोजने का प्रयास करने लगा की अचानक ही सारे पक्षी पानी में गिर गए और डूब कर मर गए|

झील के ऊपर छाए हुए वृक्ष मुरझा गए थे| कभी भूल से यदि कोई हिरण या गाय झील का पानी पी लेते तो तुरंत मर जाते|

कालिंदी झील का रहस्य

यह कोई अचरज की बात नहीं थी कि लोग उस झील के आस-पास भी जाने से कतराते थे| वे उस भूतिया जगह से दूर से ही बचकर निकलते थे| परंतु हमेशा से ऐसा नहीं था| 

एक समय था, जब वह स्थान अत्यंत पवित्रा मन जाता था| झील के समीप कुटिया में, ऋषि सौबरी रहा करते थे| उनका अधिकतर समय झील के किनारे ही या तो ध्यान करते हुए या शांत एवं शीतल वातावरण का आनंद लेते हुए व्यतीत होता था| 
झील में रहने वाली मछलियाँ और कछुए तो जैसे उनके मित्र ही थे| वे ऋषि सौबरी के पास बिना डरे आते, बल्कि खेलते थे|

एक दिन, झील के ऊपर से उड़ते हुए गरुड़ पक्षी, जो भगवान विष्णु के सेवक थे, ने स्वच्छ जल में बड़ी मछली को तैरते हुए देखा और उस पर झपटे| 
"रुको, रुको! इस झील के सभी जीवों की सुरक्षा मैं करता हूँ!" ऋषि सौबरी चिल्लाए| परंतु भूखे गरुड़ ने उनकी चेतावनी को अनसुना कर दिया|

ऋषि सौबरी ने गरुड़ को दिया शाप

क्रोधित ऋषि सौबरी  उन्हें बहुत कठोर शाप देने वाले थे, परंतु उन्हें याद आया कि गरुड़ पक्षी भगवान विष्णु के सेवक हैं| उन्होंने अपने क्रोध को रोकते हुए एक साधरण शाप दिया- "यदि कभी तुम्हारी परछाई इस झील पर पड़ी या कभी तुमने इसके जल को छुआ, तो तुम वहीँ भस्म हो जाओगे|"

गरुड़ उड़कर चले गए, परन्तु कालिंदी उनके लिए वर्जित हो गई| भले ही अब ऋषि सौबरी नहीं रहे और बहुत समय बीत चुका था|

कालिया नाग और झील का रहस्य

गरुड़ के शाप की यह बात भयंकर सर्प कालिया को पता थी| एक दिन उसने गरुड़ को अपने क्षेत्र में आने की चुनौती दे दी| जब पक्षीराज गरुड़ उसका पीछा करने लगे जो कि पकड़ने पर उसे खा जाते, कालिया नाग किसी तरीके से कालिंदी झील पहुँच गया| अब वह बिल्कुल सुरक्षित था| 

कालिया नाग एक दैत्याकार जीव था, जिसके कई फन थे| मात्रा गरुड़ ही उसका विनाश कर सकते थे| चूँकि उसे उस शाप के बारे में पता था, जिसके कारण गरुड़ उस झील के पास कभी नहीं आते थे, वह बहुत अहंकारी हो गया था| 

जल्द ही उसका पूरा परिवार भी वहीँ आ गया और वे जो विष श्रवित करते, जिससे सारा जल इतना विषैला हो गया था कि कोई भी अन्य जीव उसकी एक बूँद भी पीता तो तुरंत वहीं मर जाता| 

उन सर्पों के सांस लेने व छोड़ने के कारण वहां का वायुमंडल भी विषैला हो गया था| इसलिए वहाँ के सारे वृक्ष झुलस गए थे और झील के ऊपर से गुजरने वाले पक्षी मर जाते थे|

वृंदावन में दोपहर का समय था| कुछ कबूतरों की गुटरगूँ के आलावा चारों ओर सन्नाटा था| थोड़ी देर पहले कृष्ण नंद के घर के बहार आँगन में गाँव के बालकों के साथ खेल रहे थे| 

श्री कृष्ण का गायब होना

माता यशोदा, घर के कामों के बीच, बालकों का कोलाहल न सुनाई देने के कारण कुछ अशांत हो गई| उन्होंने खिड़की से बहार झाँका| बच्चे वहाँ नहीं थे| केवल बलराम थे, जो भूरे बछड़े को बाँध रहे थे|

"कृष्ण कहाँ है?" बहार निकलते हुए उन्होंने पूछा|
"मुझे कैसे पता होगा! मैं तो बगीचे में था और बस अभी लौटा हूँ|" बलराम ने उत्तर दिया| फिर उन्होंने चारों ओर नज़र दौड़ाई| उसके बाद वे मुख्य द्वार खोलते हुए बहार जाकर देखने लगे| माता यशोदा अभी उन्हें देख रही थीं|

"क्या कृष्ण वहाँ है?" उन्होंने जोर से आवाज देकर पूछा|
बलराम ने हाथ हिलाकर बताया 'नहीं'|
"कहाँ है वो?" माता यशोदा ने अपने धैर्य खोते हुए कहा| तब तक उनके सेवकों ने भी यशोदा का स्वर सुना| वे सब कृष्ण को ढूँढ़ने के लिए अलग-अलग दिशाओं में भागे| जल्द ही सभी सेवक और गाँव के बालक, कृष्ण को ढूँढ़ने के लिए मैदान की तरफ भागे|

जब वे कृष्ण को उनके सभी ठिकानों पर, चरगाहों और नदी के किनारे ढूँढ चुके थे, तब एक युवक वृक्ष की चोटी पर चढ़कर घाटी की ओर देखने लगा| वह अचानक जोर से चीखा|

कालिंदी झील पर बेहोश बालक

"क्या बात है?" वृक्ष के चारों ओर एकत्रित लोगों ने उससे बड़ी अधीरता से पूछा|
वह युवक कुछ न बोल सका, मात्र उस भयानक स्थान - कालिंदी झील- की ओर इशारा किया|
"वहाँ पर दो बालक लेटे हुए दिख रहे हैं- कालिंदी  झील के किनारे!" वह चिल्लाता हुआ जल्दी-जल्दी उतरा|
'हो सकता है वे केवल बेहोश हुए हों!' अन्य लोगों ने कहा|

वे सभी यह जानते थे कि यदि उन बालकों का जीवन चाहिए तो उन्हें उस  झील के विषैले वातावरण से जल्दी-से-जल्दी निकालकर लाना होगा| परंतु वे वहाँ जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे| वे हाँफते-हाँफते मुखिया नंद, यशोदा और अन्य सभी को सूचित करने भागे|

वहाँ तो खलबली ही मच गई| हर कोई कालिंदी की ओर भागा| यशोदा भी- आँसू पोंछते हुए सबके साथ वहाँ पहुँची|
वहाँ पहुँचकर, वहाँ का दृश्य देखते ही यशोदा बेहोश हो गई- बाकी सभी भौचक्के खड़े रहे|

श्री कृष्णा कालिंदी झील के अंदर

कृष्ण के साथी अपने पैर झील के पानी में डाले, बेसुध लेटे हुए थे| परंतु कृष्ण तो स्वयं ही झील में थे| वह दृश्य भयानक से भी भयानक था- कालिया नाग ने कृष्ण को बुरी तरह से जकड़ रखा था, अपनी पूँछ उनकी छाती के चारों ओर कुंडली समान लपेटी थी| कृष्ण एक पतले से वृक्ष का सहारा लिए हुए थे|

किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि अचानक बलराम आगे आकर चिल्लाए- "क्या कर रहे हो, कृष्ण?" क्या तुम मात्रा एक सर्प से डर गए? मुझे तो लगा थे कि तुम वृक्ष का सहारा लेने के अलावा कुछ और करके दिखाओगे!"

जब श्री कृष्णा ने तोड़ा कालिया नाग का घमंड

कृष्ण ने बलराम की ओर देखा और मुस्कुराए| अगले ही क्षण, उन्होंने वृक्ष का सहारा छोड़ दिया और कसमसाते हुए, कालिया नाग की जकड़ को छोड़ते हुए अपने कोमल हाथों से कालिया नाग के फणों को दबाया और उन पर चढ़ गए|

और कृष्ण कालिया नाग के ऊपर  नृत्य करने लगे- जैसे कि वह कालिया नाग का फन नहीं, बल्कि नरम-सा रंग-बिरंगा मंच उनके नृत्य करने के लिए बनवाया गया हो| 

जैसे ही कालिया नाग अपनी पूँछ से उन्हें कोड़े की तरह मारने का प्रयास करता, वे उसे पकड़कर जोर से दबा देते|

कालिया नाग छटपटाने और कराहने लगा, जोर-जोर से पानी में खलबली मचाने लगा| उसकी फुफकार तूफानी लहर के सामान सुनाई दे रही थी|

जल्दी ही कालिया नाग रक्त की उलटी करने लगा| उसकी पत्नियाँ जल के बाहर आ गईं| हाथ जोड़कर अपने पति के प्राणों को छोड़ देने के लिए कृष्ण से प्रार्थना करने लगीं| उनकी प्रार्थना से कृष्ण का हृदय पिघल गया|

कालिया नाग ने छोड़ी कालिंदी झील

कृष्ण जी ने नृत्य करना बंद किया और बोले, "क्या तुम लोग अभी ही यह झील छोड़ सकोगे? अगर तुम ऐसा करोगे, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि गरुड़ तुम्हें कोई क्षति नहीं पहुँचाएगा|"

फिर कृष्ण कूदकर झील के किनारे आ गए| इसी बीच उनके दोनों साथी जो बेहोश थे, होश में आ गए|

कालिया नाग का पूरा परिवार कृतज्ञता से चुपचाप झील छोड़कर सदा के लिए चला गया| जोर से बहती हुई हवा वहाँ के वातावरण में मौजूद सारा विष उड़ा कर ले गई| 

भारी वर्षा और नदी की बाढ़ से उस झील का सारा विषैला जल शुद्ध हो गया| 
एक बार पुनः वह स्थान सुखद और सुंदर हो गया|
भाग 4 पढ़ें: भगवान श्री कृष्णा द्वारा कुबेर पुत्रों को नारद मुनि के शाप से मुक्ति
भाग 5 पढ़ें: माखन चोरी लीला | माखन गायब होने का रहस्य

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