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दो वृक्षों की कथा- Sri Krishna Janmastmi 2020 Special

दो वृक्षों की कथा- भगवान श्री कृष्ण ने किया दो वृक्षों का शाप को ख़त्म

Sri Krishna Janmastmi 2020 Special Part 4: नमस्कार दोस्तों, आज इस लेख में हम पढ़ेंगे की कैसे श्री कृष्ण ने अपने बालपन में ही ने दो वृक्षों के शाप को ख़त्म किया| श्री कृष्ण का जन्मदिवस अर्थात कृष्ण जन्माष्टमी प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है| इस दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था| इस वर्ष श्री कृष्णा जन्माष्टमी 11-12 अगस्त को मनाई जाएगी| अगर आपने इस सीरीज कृष्ण जन्माष्टमी स्पेशल 2020 का भाग 1-श्री कृष्णा जन्म लीला , भाग 2- गुप्त बदलाव और भाग 3- पूतना वध नहीं पढ़ा है तो पहले वह अवश्य पढ़ें| दोस्तों चलिए पढ़ते है कैसे भगवान श्री कृष्ण ने दो वृक्षों के शाप को ख़त्म किया...

मनोरम गाँव

मनोरम गाँव गोपा जिस क्षेत्र में स्थित था, उस क्षेत्र का नाम 'बृज' था| बृज चारों ओर से हरी-भरी घास से भरे हुए विशाल मैदान से घिरा हुआ था| साथ ही, मैदान के चारों ओर पहाड़ियों की श्रृंखला फैली हुई थी| यमुना नदी पहाड़ियों को काटते हुए गाँव के निकट से ही जंगलों से होते हुए बहती थी|
गोपा गाँव के ग्वाले इन मैदानों में अपने मवेशी चराने आते, आनंद से घूमते और लुका-छिपी खेलते| वहीं युवा और व्यस्क जंगलों में जाकर फल और लकड़ियां इकट्ठी करते| सदियों से यह जंगल यहाँ के निवासियों के लिए बड़ा उदार व परोपकारी रहा है| 
परंतु जल्द ही स्थितियाँ परिवर्तित हुईं| 

बाघ का आतंक

वह दिन बड़ा ही शांत और उदास सा था, दोपहर के बाद का समय था| मैदान में चारों ओर चुप्पी छाई हुई थी, बस इधर-से-उधर गायों के रँभाने की आवाज, साथ ही एक बालक के आनंद में गीत गाने का स्वर सुनाई दे रहा था| थोड़ी-थोड़ी देर में नदी की ओर आती हुई पवन बड़ी-बड़ी लहरों का शोर लेकर आती|
अचानक ही एक भयानक सी चींख ने उस शांति को चीर दिया| सभी लोग अपने-अपने घरों से दौड़ते हुए रास्तों पर आ गए|
उन्होंने देखा कि वह बालक बहुत अधिक डरा हुआ ओर जोर-जोर से रोता हुआ मैदान से गाँव कि तरफ दौड़ता हुआ जा रहा है| 
"क्या हुआ बेटा?" गाँववालों ने उसे रोककर बड़े ही चिंतित स्वर में उससे पूछा| 
"बाघ-बाघ !" लड़का जोर से चिलाया| जल्द ही उसने थोड़ा सँभलते हुए बताया कि कैसे वह भयानक जंगली पशु उसकी एक गाय पर झपटा और घसीटते हुए उसे जंगलों के भीतर ले गया| 
गाँववाले भौचक्के रह गए| तभी उनमें से एक ने कहा, "जल्दी चलो, अपनी समस्या के बारे में राजा को चलकर सूचित करें|"

बाघ का तलाश

बिना समय गँवाए, गाँव के मुखिया नंद ने तलवार उठाई| साथ में गाँव के अन्य लोगों ने धनुष-बाण लिए और सीधे पहुँच गए उस स्थान में जहाँ से बाघ गाय उठाकर ले गया था| मिट्टी पर बने हुए पंजों के निशान से उन्होंने जाना कि वह हिंसक पशु सचमुच में बहुत बड़ा था|
नंद ने उसे जंगल में ढूँढ़ने का बहुत प्रयास किया, परंतु असफल रहे| जंगल बड़ा ही विशाल था और जितना वहाँ से दूर होता जा रहा था, भीतर-भीतर ही सघन होता जा रहा था | उस रात्रि बाघ पुनः वापस आया- इस बार सीधा गाँव के भीतर आ गया| वह एक गौशाला में घुसा और एक बछड़ा लेकर भाग गया| 

बाघ का गाँव के अंदर घुस आना

धीरे-धीरे लोगों को यह समझ आया कि एक नहीं, बल्कि और भी बाघ थे, जो गोपा के मवेशियों का चुपचाप शिकार कर रहे थे| उनकी बहुत सारी गाएँ खो चुकी थीं|
गाँव में तेंदुए या लकड़बग्घे का घुस आना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी| परंतु बाघों  के झुंड का गाँव के भीतर घुसना लोगों को पहली बार सुनाई दे रहा था|
जब से वसुदेव ने देवकी की आठवीं संतान को यशोदा के पास छोड़ा था, उससे पहले ही वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी अपने पुत्र के साथ नंद के घर में रह रही थीं|

वसुदेव पुत्रों का नामकरण

जल्दी दोनों भाइयों के नामकरण का शुभ दिन आया| वसुदेव ने अपने पुरोहित को गोपा गाँव भेजा| विद्वान् पुरोहित ने दोनों बालकों की जन्मपत्री पढ़कर रोहिणी के पुत्र का नाम 'बलराम' और देवकी के पुत्र का नाम 'कृष्ण' रखा| 
पुरोहित ने ये नाम इसलिए दिए, क्योंकि वे समझ गए थे कि बड़ा भाई असाधारण शक्ति अर्थात बल का धनी था और छोटा भाई अनुपम सौंदर्य का| कृष्ण का अर्थ होता है: वह जो अपने सौंदर्य से लोगों का मन आकर्षित कर ले| 
पुरोहित ने बड़े ही विश्वास से दोनों बालकों के विशेष गुणों को भी उजागर किया- कि वे दोनों किसी असाधारण व कठिन कार्य हेतु धरती पर भेजे गए हैं| उन्होंने यह भी संकेत दिया की कृष्ण कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं|

बाघ के आक्रमण का रहस्य

अब नंद और गाँववाले आक्रमण कर रहें बाघों के रहस्य को समझ चुके थे| जब भी ईश्वर मनुष्य बनकर धरती पर जन्म लेते हैं, दुष्ट शक्तियाँ बेचैन हो जाती हैं| वे उस अवतारी व्यक्ति को क्षति पहुँचाने का भरसक प्रयास करती हैं| निश्चय ही गाँव में घुस आने वाले ये बाघ इन्हीं दुष्ट शक्तियों द्वारा भेजे गए हैं- क्योंकि यह गाँव ही देव शिशु का घर है|
नंद का भय एक आश्चर्यजनक घटना द्वारा और भी मजबूत हो गया|

श्री कृष्ण का नटखट बालपन

नन्हे कृष्ण बड़े ही नटखट हो चुके थे| वे घुटने के बल रसोई में जाते और मटकी को बलपूर्वक खींचकर उसमें भरी मलाई व मक्खन को हाथों में लेकर खा लेते| साथ ही, अपने साथियों को भी खिलते| वे अकसर ही पकड़े जाते क्योंकि अपने गालों पर लगे हुए मक्खन को साफ करना भूल जाते|
ऐसा लगता जैसे भय क्या होता है उस बालक को पता ही नहीं था ! किसी दिन वे एक क्रूर साँड़ की पैनी सींगों पर लटकते हुए दिखाई देते, तो अगले दिन अत्यंत धारदार, नंगी तलवारों से खेलते हुए दिखाई देते| 
क्या ऐसे बालक को मुक्त अथवा दृष्टी से दूर छोड़ा जा सकता था? एक दिन देवी यशोदा को कुछ समय के लिए अपने पड़ोस में जाना था| वे अपनी एक भरोसेमंद दासी को कृष्ण की देखभाल के लिए छोड़कर जाना चाहती थीं, परंतु उस समय वहाँ कोई नहीं था| 

जब माता यशोदा ने श्री कृष्ण जी को रस्सी से बांधा

अतः उन्होंने एक नया तरीका अपनाया| दही मथने की रेशमी रस्सी, जो की धरती पर गड़ी हुई मोती लकड़ी में बँधी थीं और वह लकड़ी दिवार के खंभे से लगी हुई थी, उस रस्सी से कृष्ण को बाँधकर यशोदा निश्चिंत थीं कि वे रस्सी तोड़कर कहीं नहीं जा पाएँगे|
देवी यशोदा के जाते ही कुछ क्षण पश्चात सेवकों ने एक जोर का धमाका सुना| वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए की कृष्ण  तेज-बहुत तेज-घुटने के बल उस रस्सी को घसीटते हुए जा रहे थे, जिसमें खंभे से टूटी हुई लकड़ी भी बँधी हुई थी|
सेवकों ने उन्हें भागकर रोकने कि जरुरत नहीं समझी| वे रस्सी को बाँध और लकड़ी को घसीटते हुए कितने दूर जा सकते थे? सभी अचरज से देखते रहे| 
परंतु कृष्ण जी घुटनों के बल बड़ी तीव्र गति से जा रहे था|
पालक झपकते ही वे चौखट पार करते हुए पीछे आँगन कि ओर पहुँच गए| अब सभी सेवक उन्हें पकड़कर वापस लाने के लिए भागे| लेकिन कृष्ण जी की गति तीव्र होती जा रही थी|

जब लकड़ी दो वृक्षों के बीच फस गई

वे जल्दी-जल्दी अब बगीचे को पार करने के लिए दो वृक्षों के मध्य से निकले, परंतु मोटी लकड़ी जो रस्सी में बँधी हुई थी, दोनों पेड़ों के बीच में फँस गई| बालक ने रूककर पीछे पहरेदारों की तरह खड़े हुए विशाल वृक्षों को देखा| 
फिर, अपने नन्हे हाथों से, लकड़ी निकालने के लिए वृक्षों को दूर करने लगे| जो लोग उन्हें देख रहे थे वे हँसने लगे| अब उन्हें भरोसा था कि वे बच्चे को पकड़ लेंगे और गोद में उठाकर वापस ने आएँगे|

जब श्री कृष्ण ने वृक्षों को उखाड़ फेंका

परंतु ऐसा लगा कि जैसे कि अविश्वसनीय व आश्चर्यजनक घटना घटने वाली है| वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगे| अगले ही क्षण धरती फट गई और वे जड़ समेत धरती के ऊपर आकर गिर पड़े| 
धमाके के स्वर और धुल के गुबार को देख सभी लोग घबरा गए| इसी बीच देवी यशोदा वापस आ गईं| 
"कहाँ है मेरा बालक?"
वो सेवक जो अभी हक्के-बक्के से खड़े थे, अचानक ही भयभीत हो गए| वे इस कल्पना से ही काँप उठे थे कि उस बच्चे का क्या हुआ होगा| 
"कहाँ है मेरा पुत्र?" यशोदा ने दोबारा जोर से पूछा| वृक्षों का अचानक से गिर जाना बच्चे का दिखाई न देना और सेवकों के रोने जैसे सूरत से वह परेशान हो गईं| 
धूल के गुबार धीरे-धीरे बैठने लगे| ध्वस्त वृक्षों के बीच से हँसने का स्वर सुनाई दिया| जैसे बादलों के बीच से निकलता हुआ चंद्रमा अत्यंत ही सुखद लगता है,वैसे ही टूटी हुई टहनियों और पत्तियों के बीच से दिखता हुआ कृष्ण का मुस्कुराता हुआ मुखड़ा अत्यंत ही प्रिय लग रहा था|
माता यशोदा दौड़ती हुई बालक के पास गईं और उसे अपनी गोद में उठा लिया| दासियाँ भी दौड़ती हुई आईं और बालक की कमर से बँधी हुई रस्सी को खोला| 
इतने विशालकाय और पत्थर के समान तने वाले दो वृक्ष ऐसे ध्वस्त कैसे हो सकते थे? मात्र एक शिशु के साधारण से आघात से इतना बड़ा चमत्कार संभव था क्या?

गोपा के बालकों ने देखा अद्भुत दृश्य

परंतु गोपा के बालकों में से एक बालक ने कुछ अत्यंत अद्भुत दृश्य देखा था| जब वृक्ष जोर-जोर से हिलने लगे, तब उनकी चोटी पर स्थित पत्तियों ने दो भयंकर राक्षसों का रूप ले लिया| ऐसा लग रहा था जैसे वे नीचे बालक की ओर बहुत कृतज्ञता और प्रसन्नता से देख रहे थे| उस बालक को ऐसा लगा कि जैसे वे दैत्य कृष्ण को साष्टांग प्रणाम कर रहे थे|

दो वृक्षों का रहस्य

गाँव में स्थित ऋषि-मुनि और कुछ लोग- उन दोनों वृक्षों के रहस्य को जानते थे| एक समय कि बात है, दो वयस्क गंधर्व नारद ऋषि को बहुत प्रताड़ित कर रहे थे| उनके उत्पात के लिए ऋषि ने उन्हें शाप दे दिया कि वे दोनों वृक्षों के समान जन्म ले और 100 वर्षों तक मूक खड़े रहकर लोगों के द्वारा किए जाने वाले उत्पात को देखें|
बाद में वे वृक्ष, असीम आनंद से भर गए, जब उन्होंने कृष्ण को आते हुए देखा| उन्हें लगा- जैसे उनका शाप एक वरदान बनकर ख़त्म होने वाला था| ऋषि ने यह भी बताया था कि जब कृष्ण खेलते-खेलते उन्हें स्पर्श करेंगे तो वे दोनों इस शाप से मुक्त हो जाएँगे|
नंद यह सब नहीं जानते थे, अतः उन्होंने सोचा कि इस प्रकार के वृक्षों का नष्ट होना शायद कृष्ण को मारने के उद्देश्य से दुष्ट शक्तियों की कोई चाल थी|
इस आश्चर्यजनक और भयंकर घटना के शांत होने पर नंद ने विचार किया कि गोपा गाँव को छोड़कर अन्य स्थान पर बसना उनके व उनकी प्रजा के लिए उत्तम रहेगा| 
जल्द ही इस विचार को उन्होंने निर्णय में बदल दिया|

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