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पूतना वध: Jab Shri Krishna ne Kiya Putna ka Vadh

पूतना वध: Jab Shri Krishna ne Kiya Putna ka Vadh

Sri Krishna Janmastmi 2020 Special Part 3: नमस्कार दोस्तों, आज इस लेख में हम पढ़ेंगे की कैसे श्री कृष्ण ने अपने बालपन में ही राक्षसी पूतना का वध किया| श्री कृष्ण का जन्मदिवस अर्थात कृष्ण जन्माष्टमी प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है| इस दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था| इस वर्ष श्री कृष्णा जन्माष्टमी 11-12 अगस्त को मनाई जाएगी| अगर आपने इस सीरीज कृष्ण जन्माष्टमी स्पेशल 2020 का भाग 1-श्री कृष्णा जन्म लीला और भाग 2- गुप्त बदलाव नहीं पढ़ा है तो पहले वह अवश्य पढ़ें| दोस्तों चलिए पढ़ते है भगवान श्री कृष्णा के द्वारा पूतना वध की कहानी..

कंस का पश्चाताप

भयावह रात्रि का सन्नाटा प्रतिपल बढ़ता ही जा रहा था, जो कंस के महल में भी पसरा हुआ था| दुष्ट कंस मूर्ख सा बना, चकित अपने आँगन में खड़ा सूने नेत्रों से बादलों में टकटकी लगाए हुए था, जैसे कि उसे अभी भी वही भयानक गूँज सुनाई दे रही हो| 
परंतु अब बादल छँट रहे थे और मथुरा में एक नई सुबह उदित होने वाली थी| महल के चारों और बागों और फलों के उद्यानों में चिड़ियों का चहचहाना और गुंजन शुरू हो गया था| 
सूर्य कि मधुर-सी किरण सीधी आकर उसी पत्थर की शिला पर पड़ी, जिस पर एक के बाद एक देवकी के बच्चों की हत्या की गई थी|
अचानक कंस को वह शिला घृणित-सी दिखाई देने लगी| यह उसके घिनौने अपराधों की मनहूस यादगार थी| उसने स्वयं से पूछा कि इन हत्याओं का क्या अर्थ निकला? यदि उसके पापों का सारा लेखा-जोखा देवताओं के पास है, जिसके कारण उन्होंने क्रोधित होकर उसके काल कि घोषणा कर दी है, तो वह उस काल से बचने के प्रयास में अपने पापों को बढ़ा ही तो रहा था ! तभी एक गुप्तचर ने आकर उसे सूचना दी कि कुछ संन्यासी कह रहे हैं- जिन शिशुओं कि उसने हत्या की, वे भगवान विष्णु के भक्त थे और कंस के पापों का घड़ा भरने के लिए ही उनका जन्म हुआ था ! 
कुछ लोगों का तो कहना था कि यदि कंस की मति अपने काल के भय के कब्जे में नहीं आती, तो निश्चय ही वह असंख्य निर्दोष लोगों की हत्या करता, अपनी प्रजा पर अत्याचार करता, पड़ोसी राज्यों का विनाश करता| क्या लोगों द्वारा उस पर लगाया गया यह कलंक सत्य है? वह अचरजपूर्वक विचार करने लगा| 

जब कंस गया देवकी और वसुदेव से मिलने

दिन चढ़ रहा था, धुप बढ़ रही थी परंतु उसे हर ओर अंधकार ही दिख रहा था| देवकी का दुःख से भरा चेहरा उसे भयभीत कर रहा था| बहुत थके हुए कदमों से वह देवकी के कक्ष तक गया| वह अभी भी बेसुध पड़ी हुई थी| वसुदेव उसके बगल में धरती पर बैठे उसके मुख पर पानी छिड़क रहे थे|
"अब तुम्हें हमसे क्या चाहिए, कंस? एक बार तुम देवकी की हत्या करने को तत्पर थे और मैंने तुम्हें रोक दिया था| परंतु अब हमें यह जीवन जीने की कोई लालसा नहीं हैं| अब तुम हमें मारकर सभी कष्टों से मुक्त क्यों नहीं कर देते?" वसुदेव ने बड़ी ही कठोरता से कहा| "मेरे भाई, मैं तुम्हें इस बंदी गृह से मुक्ति दिलाने आया हूँ| सचमुच, मैंने तुम्हारे साथ बड़ी निर्दयता की| इसके लिए मैं बहुत लज्जित और क्षमाप्रार्थी हूँ| यह सब कुछ देवताओं की चाल है| परंतु अब मैं देखता हूँ कि कैसे वे मुझे इन निरर्थक कृत्यों के लिए बहकाते और भ्रमित करते हैं !"
कंस ने वसुदेव और देवकी से ढेर सारी तरह-तरह की बातें करके क्षमायाचना की और उनके घर जाने का प्रबंध किया| इसके बाद उसने अपने मंत्रियों को अत्यावश्यक बैठक के लिए तुरंत बुलावा भेजा| 

कंस की मंत्रियों के साथ बातचीत

अभी-अभी हुए सारे घटनाक्रम को वे मंत्री पहले से ही सुन चुके थे| उनमें से एक ने कहा "स्वामी, यदि देवता आपको भाँति-भाँति प्रकार से तंग कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि वे आपका सामना करने से दर रहे हैं| अब ऐसे कायरों से हमें घबराने कि क्या आवश्यकता है?" "मैं भूल नहीं सकता कि कैसे एक बार देवता आपसे दर कर भागे थे, जब आपने उन पर आक्रमण किया था, जैसे किसी सिंह के आगे से हिरण दर कर भागे," अन्य मंत्री ने ऐसा कहा| 
दूसरे मंत्री भी देवताओं का इसी प्रकार उपहास करते हुए पशुओं की भाँति अट्टहास करने लगे| कंस, जो अभी कुछ समय पहले तक पश्चाताप में डूबा हुआ था, पुनः अपनी प्रशंसा से प्रसन्न हो गया| 
परंतु उनमें से एक वृद्ध मंत्री अभी गंभीर थे| जब सभी का हास-परिहास बंद हुआ तो वे बोले, "निश्चय ही हमारे महाराज के समान अन्य कोई नहीं है| देवता भी इनकी बराबरी नहीं कर सकते| परंतु मैंने भी उन ऋषि-मुनियों को कहते हुए सुना है कि स्वयं भगवान विष्णु शक्तिशाली और अत्याचारी राजाओं का दमन करने धरती पर आ रहे हैं| इस बात से मैं बड़ा चिंतित हूँ| वे सर्वाधिक बलशाली हैं| यदि उन्होंने किसी लक्ष्य प्राप्ति का निर्णय कर लिया है तो हमारे द्वारा खड़ी की गई हर बाधा ऐसी प्रतीत होगी, जैसे जल की आती हुई भयंकर लहरों को मुट्ठी भर-भर रह डाल कर रोका जाए|"

कंस का घमंड

वृद्ध मंत्री ने सभी के आनंद में विघ्न डाल दिया था| एक क्षण के लिए सभी लोग आशंकित हो, शांत हो गए थे| अचानक कंस अपनी ताल ठोंकते हुए गरजा- "परंतु मैं स्वयं को विष्णु की दया पर नहीं छोड़ सकता ! मैं उसकी योजनाओं को असफल करने का हर प्रयास करूँगा| क्या इसके लिए तुम सब कोई बढ़िया उपाय सुझा सकते हो?"
"मेरे पास एक बड़ा कारगर उपाय है| आपके शत्रु का जन्म हाल ही में हुआ है- भले ही हम यह नहीं जानते कि वह कहाँ है | ठीक?" दैत्य सलाहकार ने पूछा| 
"ठीक," कंस ने उत्तर दिया| 
"क्यों न हम अपने राज्य के एक वर्ष से काम आयु के सभी शिशुओं कि हत्या करवा दें?" मंत्री ने सलाह देते हुए कंस से पूछा|
"कितना अद्भुत उपाय है !" कंस खुशी से उछल पड़ा| वहाँ उपस्थित अन्य सभी भी आनंदित हो उठे| कंस ने तुरंत अपने गले से एक अनमोल हार निकाला और उस सलाहकार को पुरस्कार में दें दिया| 

दैत्यों को बुलावा

बिना समय गँवाए कंस ने गुप्त कक्ष में सर्वाधिक चालाक, क्रूर, भयानक, दैत्यों व राक्षसियों को बुलावा भेजा| 
"तुम सभी को मेरे राज्य में और मेरे पड़ोसी राज्यों में इस एक वर्ष के भीतर पैदा होने वाले सभी नवजात शिशुओं कि हत्या करना है| यह सब कैसे करना है यह सोचना तुम्हारा काम है !"
सभी दैत्यों और राक्षसियों ने एक-दूसरे कि ओर देखा, उनके नेत्रों से अंगारे भभक रहे थे| कुछ तो बसी ही मुश्किल से अपनी प्रसन्नता दबा पा रहे थे, साथ ही बड़ी अधीरता से अपने हाथों को मसल रहे थे और बड़ी अजीब से धूर्त प्रकार के शब्द निकाल रहे थे| 
"महाराज, आपने हमें बिल्कुल हमारे मन का काम दिया है ! बड़े और अनुभवी दैत्य ने कहा|" "हे महाराजाधिराज ! कितना समय बीत गया, हमने इस प्रकार का कोई भी उत्साहपूर्ण कार्य नहीं किया है !" छोटे दैत्य ने खिलखिलाते हुए कहा| 
"जबसे आपने देवकी के शिशुओं कि हत्या शुरू की, हमारा बड़ा मन था बच्चों की हत्या का, यह सबसे बढ़िया और मनोरंजक खेल खेलने का, हम तो इसमें हाथ आजमाने के लिए तरस रहे थे !" एक बड़े दैत्य ने खुलकर कहा|
"मैं रात्रि में सियार बन जाऊँगा और भोर होते-होते चीता बन जाऊँगा, फिर बच्चों को उनकी माँओं के पास से घसीटकर ले आऊँगा," एक अन्य दैत्य ने अपने मुँह से टपकती हुई लार को चाटते हुए कहा| 

पूतना को श्री कृष्ण के वध का कार्य सौंपा गया

"परंतु तुम सब में से कोई भी कुलीन घरों के भीतर तक प्रवेश नहीं कर सकता, कर सकता हैं क्या?" अपनी धूर्तता व मक्कारी के लिए कुख्यात राक्षसी पूतना ने सबको चुनौती देते हुए कहा|
पूतना को देखते ही कंस के मुख पर चमक आ गई| "मेरी प्रिय पूतना, तुम्हारी क्षमताओं और कौशल पर मुझे सबसे अधिक भरोसा है|" प्यार से मुस्कुराते कंस ने पूतना से कहा| 
"जानती हूँ महाराज," राक्षसी ने बड़े घमंड से कहा| "मैं दावा कर सकती हूँ कि जहाँ ये सारे सूरमा असफल हो जाएँगे, मैं वहाँ भी अपना काम कर जाऊँगी| मेरे स्तनों में भयंकर विष भरा हुआ है और यदि मैं किसी भी शिशु को स्तनपान कराऊँ तो तुरंत उसकी मृत्यु हो जाएगी|"
"अद्भुत, अद्भुत !" कंस मारे खुशी से उत्साहित हो उठा| 

पुत्र प्राप्ति का उत्सव

दूसरी तरफ यमुना के उस पार बेस समृद्धशाली गाँव गोपा में आज सभी गाँव वाले बड़े उत्साह और आनंद में थे, क्योंकि उनके राजा नंद के यहाँ पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी| सारे पुरुष उस शुभ अवसर पर उत्सव के आयोजन की तैयारी में जुटे थे, तो सारी महिलाएँ अपनी रानी को बधाई दें रही थीं, शंख बजा रही थीं, मालाएँ पहना रही थीं, और अन्य शुभ वस्तुएँ भेंट में दें रही थीं|

पूतना का नंद के घर में प्रवेश

जब यशोदा के घर से लोगों की भीड़-भाड़ समाप्त हुई तब खूब सजी-सवँरी, बहुत ही सुंदर सी स्त्री का घर में प्रवेश हुआ| उसने बहुत ही सुंदर आभूषणों से श्रृंगार किया था और उसकी चाल से ही तेज व राजत्व झलक रहा था| चूँकि वह उत्साह का दिन था अतः भवन के द्वार सभी के लिए खुले हुए थे| यह जानते हुए भी कि वह स्त्री गोपा कि निवासी नहीं है, किसी भी पहरेदार ने उसे भीतर जाने से नहीं रोका| 
दासियों ने उसका बड़ा सत्कार किया| उन्होंने सोचा कि सभी की तरह यह भी देवी यशोदा को बधाई देने आई है| 
"मैंने सुना है कि राजा नंद और रानी यशोदा के घर पुत्ररत्न कि प्राप्ति हुई है| मैं उस बच्चे की एक झलक देखने के लिए बहुत अधिक आतुर हूँ| क्योंकि मैंने हाल ही में अपने बच्चे को खोया है !"
"बड़ा दुःख हुआ सुनकर ! तुम कहाँ से आई हो, बहन?" देवी यशोदा की प्रमुख दासी ने पूछा|
 "मथुरा से," स्त्री ने उत्तर देते हुए देवी यशोदा के लिए बहुत लगाव भरी बातें की| जैसे ही उसकी दृष्टी रत्न जड़ित झूले में लेटे हुए बच्चे पर पड़ी, वह अपलक देखती रह गई- उससे पहले आने वाले लोग भी ऐसे ही उस शिशु को निहारते थे, क्योंकि वह शिशु अद्वितीय रूप से सुंदर था| 
परंतु उसके नेत्रों में एक क्षण के लिए जो भयानक दुष्टता चमकी, वह कोई नहीं देख पाया| 

पूतना ने कराया श्री कृष्ण को स्तनपान

वह बसी देर तक बच्चे को निहारती रही, फिर अपने मुख पर एक झूठा प्रेम दर्शाते हुए देवी यशोदा से उसने प्रार्थना की- "हे दयालु देवी! चूँकि मैंने पिछले दिन ही अपना बच्चा खोया है, मेरी बहुत इच्छा हो रही है आपके पुत्र को स्तनपान कराने की, जिसे मैं बड़ी पीड़ा से रोक पा रही हूँ| क्या आप इस विशेष कार्य के लिए अनुमति देने की कृपा नहीं कर सकतीं?"
"क्यों नहीं, बहन| बड़ी ही खुशी से ! मेरे बच्चे को अपने ही बच्चे जैसा समझो| तुम्हारी ममता से यह बच्चा अधिक शक्तिशाली होगा," यशोदा ने बड़े ही प्रेमपूर्वक कहा| 
"यह पहले से ही शक्तिशाली है !" स्त्री ने बच्चे को स्तनपान कृते हुए कहा| जल्दी ही उसका चेहरा आश्चर्य से भर गया| "सचमुच शक्ति है इसमें - अत्यधिक शक्ति-अद्भुत शक्ति, मैं बिल्कुल यही कहूँगी| जिस प्रकार यह स्तनपान कर रहा है !" स्त्री बार-बार कहने लगी| उसका स्वर बहुत तीव्र हो गया जैसे कि वह बड़ी पीड़ा में हो|
यशोदा व उसकी दसियों को लगा कि वह अपरिचित स्त्री बच्चे के शक्तिशाली होने की बात पर स्नेह भरा विनोद कर रही है, वे सभी हँसने लगीं| 

पूतना का वध

"तुम सब चुप रहोगी क्या?" उसका बहुत ही कर्कश स्वर सुनाई पड़ा| सबने देखा कि वह बच्चे को अपने स्तन से छुड़ाने का प्रयास कर रही थी| उसकी आकृति बदलने लगी थी| उसका सुंदर मुख न केवल कुरूप बल्कि बड़ा, भद्दा और अजीब-सा हो गया था|
देवी यशोदा और उनकी दासियाँ यह सब देख चकित रह गईं| वे सभी बच्चे को वापस छुड़ाने का प्रयास करने लगीं, परंतु असफल रहीं| उस स्त्री का आकार बहुत ही घिनौना था और बढ़ता ही जा रहा था| बच्चा उसके स्तन पर ही था, परंतु यशोदा और उसकी दसियों की पहुँच से बहुत ऊपर था|
उस अपरिचित स्त्री का चेहरा बड़ा ही दैत्याकार व भयानक हो गया था| उसकी भुजाएँ बड़ी ही भयावह दिख रही थीं| फिर पूरे भवन को हिला देने वाली एक कर्कश चीख के साथ वह शिथिल होकर गिर पड़ी| वह यशोदा के कक्ष की दिवार से टकराई और उस पलंग पर लगे खंभे उसके भीमकाय आकार की वजह से चूर-चूर हो गए|
भवन के भीतर रहने वाले सभी लोग, दास-दासियाँ, द्वारपाल भागते हुए उस स्थान पर आ गए| उनके पीछे-पीछे गाँव की सारी जनता भी वहाँ पहुँच गई| 
देवी यशोदा मूर्च्छित हो चुकी थीं| उनकी दासियों ने राक्षसी के ऊपर चढ़कर बालक को निकाला| 
"हे ईश्वर, यह राक्षसी मनुष्य का रूप धारण कर यहाँ क्यों आई थी?" उसके भयानक और पसरे हुए आकार को देखकर नंद ने चौंकते हुए कहा|
 "परंतु यह कोई और नहीं, बल्कि राक्षसी पूतना है !" उनमें से एक ने उसे पहचानकर चिल्लाते हुए कहा| 
"यह राक्षसी, निश्चय ही इस बालक को अपना विषैला स्तनपान कराकर इसकी हत्या करने आई थी- इसका यह धूर्त चरित्र सभी जानते हैं- परंतु बालक ने तो जैसे उसके जीवन का ही पान कर लिया !" उसके बाद वहाँ एकदम सन्नाटा छा गया|
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