sri krishna janmashtami 2020 special sri krishna makhan chori leela
माखन चोरी लीला | माखन गायब होने का रहस्य

श्री कृष्ण माखन चोरी लीला | माखन गायब होने का रहस्य | Makhan Chori Leela

Sri Krishna Janmastmi 2020 Special Part 5: नमस्कार दोस्तों, आज इस लेख में हम माखन गायब होने के रहस्य को पढ़ेंगे| श्री कृष्ण का जन्मदिवस अर्थात कृष्ण जन्माष्टमी प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है| इस दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था| अगर आपने इस सीरीज कृष्ण जन्माष्टमी स्पेशल 2020 का भाग 1-श्री कृष्णा जन्म लीला , भाग 2- गुप्त बदलाव, भाग 3- पूतना वध और भाग 4- भगवान श्री कृष्णा द्वारा कुबेर पुत्रों को नारद मुनि के शाप से मुक्ति नहीं पढ़ा है तो पहले वह अवश्य पढ़ें| दोस्तों चलिए पढ़ते है, माखन गायब होने के रहस्य को...

कृष्ण और बलराम की शरारतें

जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, कृष्ण और बलराम की शरारतों तो रोक पाना यशोदा रोहिणी के लिए बहुत कठिन होता जा रहा था| जब उन दोनों को शरारत सूझती, तो हवा के समान तेज हो जाते और छलपूर्वक सबको सताते
भवन में रहने वाली दासियों के लिए भी उन्हें पकड़ पाना असंभव हो जाता| और जब वे छिप जाते, चतुर-से-चतुर गुप्तचर भी ढूँढ नहीं पाते| वे दोनों भवन के सभी कोनो और छिप सकने वाली जगह जानते थे| 
अन्न भंडार, बगीचे, फल उद्यान, जहाँ झाड़ियों के पीछे सियार और नेवले छिपते थे, तालाब के किनारे बने पत्थर की सीढ़ियाँ जहाँ पानी पर खिले हुए पुष्पों के बीच में कछुए तैरा करते थे- ये सारी जगहें उन्हें अपने खिलौने की आलमारी सरीखी सहज लगती थीं|
जब तक वे नंद के घर और उसके चारों ओर फैले हुए परिसर में रहते, उन्हें किसी भी प्रकार की कोई चिंता नहीं होती| परन्तु वे स्वयं को आस-पड़ोस के भी घरों का स्वामी समझते थे|

मक्खन चोरी लीला

यदि एक घर से ताजे मक्खन की मटकी गायब करते, तो बगल वाले घर से दूध के ऊपर की मलाई साफ़ कर जाते|
और इन शरारतों में न केवल ये दो राजकुमार ही शामिल थे, बल्कि गाँव का एक भी बालक ऐसा नहीं था, जो उनका साथ न देता हो| गोपा गाँव के सभी बालकों में इन दोनों भाइयों की बड़ी धाक थी! दिन-प्रतिदिन इस धमाचौकड़ी टोली ने गाँव के किसी भी घर की रसोई या भंडारगृह को नहीं छोड़ा और लोगों का चैन छीन लिया|

कृष्ण और बलराम की शिकायत

एक दिन जब देवी यशोदा अपने आँगन में खड़ी थीं, उन्होंने आस-पड़ोस की बहुत औरतों को अपनी ओर आते देखा| ये कोई नई बात नहीं थी| उन्हें यशोदा से बतियाना बड़ा भाता था| बल्कि सम्पूर्ण गोपा गाँव एक परिवार समान था| 
परंतु इस बार ये औरतें बड़ी हैरान और समस्याग्रस्त दिखाई पड़ रही थीं, जैसे कि वे जो कहने आईं हैं वह उन्हें न चाहते हुए भी कहना होगा|
"आओ बहनों, ऐसा लगता है जैसे की कोई गंभीर बात हो गई है !" यशोदा ने कहा|
"हाँ, कुछ असामान्य है, जो हमें आपसे कहना ही होगा| यह बात बलराम और कृष्ण के बारे में है| कृष्ण, भले ही छोटा है, परन्तु इन सारी शरारतों के पीछे उसी की बुद्धि होती है," एक औरत ने हाथ हिला-हिला कर यशोदा को बताया|
"शरारत?" यशोदा ने झूठा अचरज दिखते हुए कहा, जबकि यह सूचना उनके लिए नई नहीं थी|
सभी एक साथ एक स्वर में बोलीं-
"हाँ, हाँ, शरारत..."
"शरारत, पूरी शरारत ..."
"जिसका कोई अंत नहीं ..."
हर एक औरत दोनों बालकों की शिकायत लिए तैयार खड़ी थी| कोई भी अपनी शिकायत समाप्त करने से पहले दूसरी को बोलने का अवसर ही नहीं दे रही थी|

मटकी को ऊपर टाँगने का उपाय

"मैं समझ गई, बिल्कुल समझ गई, बहनों| दोनों नटखट बालकों ने तुम्हारे दूध, दही, मक्खन और मलाई के लिए उत्पात मचा रखा है| परंतु क्या तुम सब अपनी-अपनी मटकी ऊपर नहीं टाँग सकतीं- उनकी पहुँच से बहुत ऊपर?" यशोदा ने आग्रह किया|
"हमने यह प्रयास भी कर लिया| हे देवी! सचमुच हमने ऐसा ही किया, परन्तु सब व्यर्थ रहा!" पुनः सभी एक साथ बोल पड़ीं|
"यह तो बड़ा अचंभा है !" यशोदा ने चिंतित स्वर में कहा|
"हमें भी कम अचंभा नहीं हुआ है !" औरतों ने कहा|

श्री कृष्ण को यशोदा माँ द्वारा दंड

"लो, कृष्ण आ गया| मैं तुम सभी के सामने उसे दंड दूँगी," द्वार के पीछे से झाँक कर मुस्काते हुए बालक की ओर देखकर यशोदा ने कहा| "अब क्या तुम सब लोग दूर-दूर फैलकर एक घेरा नहीं बनाओगी, ताकि यह नटखट बालक बचकर भाग न पाए|"
अपने छोटे-से मुकुट में मोरपंख सजाए हुए, कमर में सोने की करधन लटकाए हुए, भागते-भागते कृष्ण यशोदा के पास आए| मैया योशिदा की गोद में जाने की इच्छा से उन्होंने अपने हाथ ऊपर उठाए हुए थे| परंतु यशोदा चिंतित मुद्रा में खड़ी थीं, उनके हाथ उनकी कमर पर थे, उन्होंने बच्चे की ओर थोड़ी भी ममता नहीं दिखाई|
और वह बालक, अपने हाथ उठाए, उन औरतों की ओर देखने लगा जैसे कि वह अपनी माँ की कठोरता के प्रति उनसे सहानुभूति चाह रहा हो|

जब सभी अपनी शिकायतें भूल गईं

एकदम से सभी औरतें अपनी बाहें फैलाकर बच्चे की ओर बढ़ीं, जो अभी स्थान-स्थान पर कृष्ण को पकड़ने के लिए सुरक्षा में लगी थीं, अब उसे गोद में लेने के लिए आतुर हो गईं| 
कृष्ण, एक औरत की ओर आगे बढ़ते और जैसे ही वह उन्हें गोद में लेने के लिए बढ़ती, पुनः खिलखिलाते हुए उलटे पाँव वापस भागते, फिर दूसरी औरत की ओर जाते और ऐसे ही खेलते| 
सभी ठहाका लगाकर हँसने लगीं- कृष्ण की करधन इस गुंजित स्वर में संगीत की ध्वनि के समान बज रही थी- और प्रत्येक औरत मुग्ध होकर इस खेल को खेल रही थी| कृष्ण एक को थोड़ा-सा छूते और दूसरी ओर भाग जाते|
यह सब देर तक चलता रहा, इस बीच यशोदा दूर खड़ी अचरजपूर्वक आनंद से सारा नाटक देख रही थीं|
इन औरतों की शिकायत का क्या हुआ? इनकी उलाहना का क्या हुआ?
परंतु वे अधिक देर तक मुस्कराती हुई खड़ी नहीं रह सकीं| औरतों को आनंद में देखकर उनका हृदय भी ममता से भर गया| उन्हें पता ही नहीं चला कि वे कब आगे आईं और कब कृष्ण को गोद में उठा लिया| कुछ देर तक हँसने-खिलखिलाने के बाद औरतें भी वहाँ से चली गईं|
सचमुच, वे सुख व आनंद कि चमक साथ लेकर गईं|

जब यशोदा माँ न स्वयं माखन चोरी होते देखा

यह रहस्य जानने में यशोदा को कुछ और दिन लगे कि मक्खन-मलाई के पात्र को बच्चों की पहुँच से दूर, ऊपर लटकने पर भी वह कैसे गायब हो जता है| उन्होंने स्वयं उस पात्र को बहुत सुरक्षित तरीके से लटकाया हुआ था|
संध्या का समय था| वह नदी से रोज की अपेक्षा जल्दी लौट आईं| उन्हें लगा जैसे कि उनकी रसोई में चुपचाप कुछ हो रहा है|
धीरे-धीरे, हलके क़दमों से उन्होंने खिड़की से रसोई में झाँक कर देखा| वहाँ का दृश्य ऐसा था जिसकी वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकती थीं| 
वहाँ चार-पाँच लड़के थे, जो घुटनों पर खड़े, एक-दूसरे की पीठ पर चढ़े हुए थे| उस मानव पर्वत की चोटी पर कृष्ण खड़े थे और मक्खन में गोले निकलने में लगे हुए थे| यशोदा हक्की-बक्की-सी चुपचाप खड़ी देखती रहीं| 
परंतु जैसे ही कृष्ण ने उन्हें देखा, निचे कूद पड़े| बालक भी चकित होकर अपनी योजना से छिन्न-भिन्न हो गए और एक कतार में ठिठियाते हुए द्वार से निकल गए| निश्चय ही कृष्ण, उनमें सबसे आगे थे|
कुछ देर बाद बलराम यशोदा के पास भागते-भागते आए|

जब श्री कृष्णा ने मिट्टी खाई

"चची ! कृष्ण मक्खन नहीं खा पाया, इसलिए उसने मिट्टी कि धूल भरकर खा ली !" उन्होंने बड़ी हैरानी से सूचना दी|
"आज इस उपद्रवी बालक को सबक सिखाना ही होगा !" यशोदा माँ ने चिल्लाते हुए कहा| वह तुरंत रसोई से भागती हुई बरामदे में आईं और कृष्ण को पकड़ लिया|
"हठी, उपद्रवी बालक ! मुँह खोल अपना !" घुटने के बल बैठकर, कृष्ण के नन्हे हाथों  को जोर से पकड़कर यशोदा ने आदेश दिया|
परंतु कृष्ण अपना मुँह बंद रखे और ठुड्डी ऊपर किए रहे|
"कितनी मिट्टी है तेरे मुँह में?" मैया ने पूछा, और धीरे-से बालक के गालों को दबाया|

यशोदा माँ ने किये सम्पूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन

कृष्ण ने अपना मुँह खोला|
देवी यशोदा ने उनके मुँह में झाँका, तो स्तब्ध और मुग्ध होकर रह गई|
उन्होंने बालक में मुँह में संपूर्ण ब्रह्मांड देखा- तारे, सूर्य, ग्रह, बादल, उल्कापिंडों का इधर-से-उधर भ्रमण और बवंडर|
यह दृश्य पलक झपकते ओझल हो गया| माता यशोदा निढाल होकर बैठ गईं, परंतु अब परम शांति की स्थिति में थीं|


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