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Shri Krishna Govardhan Leela in Hindi: Govardhan Parvat Story

उँगली पर पर्वत: Shri Krishna Govardhan Leela in Hindi | Sri Krishna Janmastmi 2020 Special Part 7


Shri Krishna Govardhan Leela Story in Hindi: नमस्कार दोस्तों, अगर आपने इस सीरीज कृष्ण जन्माष्टमी स्पेशल 2020 का भाग 1-श्री कृष्णा जन्म लीला , भाग 2- गुप्त बदलाव, भाग 3- पूतना वध , भाग 4- भगवान श्री कृष्णा द्वारा कुबेर पुत्रों को नारद मुनि के शाप से मुक्ति और भाग 5- माखन चोरी लीला  और भाग 6श्री कृष्ण और कालिया नाग की कहानी नहीं पढ़ा है तो पहले वह अवश्य पढ़ें| दोस्तों चलिए पढ़ते है, श्री कृष्ण की गोवर्धन लीला को...

भगवान इंद्र की पूजा की तैयारी (Bhagwan Indra ki Pooja ki Taiyari)

श्री कृष्ण ने देखा कि उनके पालक पिता नंद, किसी त्योहार कि व्यवस्था में जुटे हुए हैं| मैदान से बड़े-बड़े पत्थर और झाड़ियाँ हटाकर उसे साफ़ किया जा रहा था| एक मंच बनाया गया था, जिस पर चंदन की लड़की के छोटे-बड़े टुकड़ों का ढेर रखा हुआ था

नंद ज्योतिषियों से उस त्यौहार के रीति-रिवाजों को आरंभ करने के लिए शुभ मुहूर्त के बारे में विमर्श कर रहे थे| उन्होंने अलग-अलग लोगों को अलग-अलग काम दे रखे थे|

भगवान श्री कृष्ण के प्रश्न (Bhagwan Shri Krishna ke Prashn)

"आप कौन-सा आयोजन कराने वाले हैं, पिताजी?" कृष्ण ने नंद से पूछा|
"अब भगवान इंद्र की पूजा करने का समय आ गया है| हम उनके सम्मान में यज्ञ करेंगे," नंद ने उत्तर दिया|

"इंद्र कौन हैं?"
"वे देवता हैं, बल्कि देवताओं के राजा हैं| वर्षा, बिजली का चमकना सब उन्हीं के आदेश से होता है|"

"वर्षा करने और बिजली चमकाने की शक्ति उन्हें किसने दी हैं?" कृष्ण ने पूछा|
"निश्चय ही, परमेश्वर ने!" नंद ने उत्तर दिया|
"तो आप इंद्र की पूजा करने के स्थान पर परमेश्वर की पूजा क्यों नहीं करते?"
नंद सात वर्ष के बालक से ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं कर रहे थे| कुछ देर सोचकर उन्होंने कहा, "यह हमारी परंपरा है!"


इंद्र देव के पूजन की परंपरा (Indra Dev ke Poojan ki Parampara )

"पिताजी, अब समय आ गया गया है इस परंपरा को समाप्त करने का अथवा इसे सुधारने का| सभी देवी-देवता, परमपिता परमेश्वर की शक्तियों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं|

परंतु जिनके जीवन में छोटे उद्देश्य होते हैं, वे इन देवी-देवताओं को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं| हमारा भाग्य हमारे विचारों और कर्मों से बनता है| क्या देवता हमारा भाग्य बदल सकते हैं? कभी नहीं| केवल परमपिता परमेश्वर ही हमें सद्मार्ग दिखा सकते हैं| 

हमे उनसे प्रार्थना करनी चाहिए और उनके निकट जाना चाहिए| मेरे अनुसार, जैसे आपने पुराना गाँव छोड़ दिया है, वैसे ही यह पुरानी परंपरा भी छोड़ दीजिए!" मुखिया नंद के साथ गाँव के अन्य प्रतिष्ठित लोग भी खड़े थे|
वे बहुत चिंतित दिखे| वे जानते थे कि कृष्ण सत्य कह रहे थे, परंतु इतनी पुरानी परंपरा को तोड़ना आसान नहीं था|

लोग अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं के अनुसार अलग-अलग देवी-देवता को पूजते थे| देवताओं के पास उनकी आशाओं को पूरा करने की शक्ति भी थी| वृंदावन कि प्रजा बड़ी ही पुण्य आत्मा थी| 

परमपिता परमेश्वर की कृपा उन पर बनी रहे, यही उनकी एकमात्र अभिलाषा थी| कृष्ण यह जानते थे कि उन्होंने जो भी कहा, इन पुण्य आत्माओं की यही सबसे बड़ी इच्छा थी| 
फिर भी, इतनी पुरानी परंपरा को तोड़ने के लिए इन आमजनों का साहस जुटा पाना कठिन था| अतः इस कार्य के लिए एक उदाहरण  प्रस्तुत कारण आवश्यक था ताकि ये लोग जीवन में प्रगति कर सकें|


इंद्र पूजन की परंपरा को तोड़ने का विचार (Indra Poojan ki parampara ko Todne ka Vichar)

"क्या आप इस परंपरा को तोड़ने से डर रहे हैं?" कृष्ण ने उनसे उत्तर माँगा| नंद और अन्य व्यक्ति चुप रहे|
"यदि आप परमेश्वर के भक्त हैं, तो किसी भी अन्य शक्ति से क्यों डरते हैं?"

"सत्य है, हमें किसी भी प्रकार की शक्ति से नहीं डरना चाहिए| परंतु हमारी प्रजा कभी-न-कभी तो इस त्योहार को मनाना चाहेगी|" प्रतिष्ठित जनों में एक ने कहा|

गोवर्धन पर्वत की पूजा (Govardhan Parvat ki Pooja)

"तो हम यही त्योहार गोवर्धन पर्वत के सम्मान में क्यों नहीं मानते, जो कि एक पहरेदार कि भाँति हमारी सुरक्षा में खड़ा रहता है? ईश्वर हर जगह है- सारी प्रकृति में है| आप किसी भी वस्तु में ईश्वर की उपस्थिति मानकर उसकी पूजा कर सकते हैं," कृष्ण बोले, "और गोवर्धन तो हमारा अत्यंत शांत और महान मित्र है!"

यह एक नया विचार था| अब क्या था, कृष्ण के शब्दों ने सब पर ऐसा प्रभाव डाला कि सब सम्मोहित हो गए|

यज्ञ की वेदी गोवर्धन पर्वत के नीचे बनाई गई| शुभ मुहूर्त वाले दिन, गोवर्धन की प्रशंसा में गीत गाए गए| फल-फूल चढ़ाए गए| सभी लोग बहुत उत्साहित थे| पर्वत स्वयं भी बहुत चमकीला आकर्षक और प्रसन्न दिखाई दे रहा था|


भगवान इंद्र का क्रोध (Bhagwan Indra ka Krodh)

परंतु बादलों के ऊपर, इंद्र की भौंहें तन गईं थी| पहले तो उन्हें आश्चर्य हुआ, बाद में बहुत क्रोध आया| वे व्यक्ति जो अपने पूर्वजों के समान वर्षों से उनकी पूजा करते चले आ रहे थे, अचानक ही उनकी उपेक्षा कैसे कर सकते थे? इस परंपरा को तोड़ने के लिए उन्हें किसने प्रेरित किया?

उन्हें सबक सिखाना ही होगा, क्रोध से भभक रहे इंद्र ने निश्चय किया|
उन्होंने 39 अलग-अलग प्रकार के पवनों को बुलावा भेजा और वृंदावन में भयंकर तूफ़ान लाने का आदेश दिया| 

उन्होंने बहुत दूर-दूर से बादलों को बुलाया और युद्ध के लिए तैयार किया| उन्होंने बिजली को अपने हाथों में पकड़ा और नीचे आनंदपूर्ण घाटी की ओर बड़े ही तिरस्कार से देखा|

वृंदावन में आँधी तूफ़ान (Vrindavan me Aandhi Toofan)

युद्ध का प्रारंभ आँधी-तूफान से हुआ, जिससे यज्ञ की अग्नि काँपने लगी| पवनें तीव्र और तीव्र होती जा रही थीं| काले और भयानक आसमान को देखकर पुरोहित ने मंत्र पढ़ने बंद कर दिए और लोगों ने ढोल बजाना गीत गाना बंद कर दिया| बड़े-बड़े बादल नीचे भीड़ की तरफ तीव्रता से बढ़ने लगे|

वायु की गति भयंकर तीव्र होती जा रही थी और वह सभी दिशाओं से दवाब बना रही थी| बवंडर ने यज्ञ की अग्नि को बुझा  दिया| 
यज्ञ की रीति के लिए जितनी भी सामग्री जुटाई गई थी, वह उस बवंडर के साथ ऊपर हवा में उड़ती हुई फिर नीचे गिरकर बिखर गई|

बवंडर के बाद बादलों ने वर्षा शुरू कर दी| जल्दी ही मूसलाधार वर्षा होने लगी| बिजली की तीव्र चमक और बादलों की तेज गड़गड़ाहट ने जैसे लोगों को अंधा और बहरा कर दिया था|

लोगों की सारी भीड़ कृष्ण के चारों ओर इकट्ठी हो गई| जो लोग घरों में थे, वे भी बाहर आकर दौड़ते हुए भीड़ के साथ हो गए| वे सभी अपनी सुरक्षा हेतु निहार रहे थे| वे निश्चय ही, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उनका नन्हा और प्रिय कृष्ण प्रकृति के इस भयंकर प्रकोप से उनकी सुरक्षा कैसे करेगा|


जब भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली पर उठाया (Shri Krishna ne Uthaya Govardhan Parvat ko)

परंतु उनका भरोसा गलत सिद्ध नहीं हुआ| कृष्ण तो चमत्कार करने को तैयार ही थे, एक अकल्पनीय कार्य- अतुलनीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने विशाल गोवर्धन पर्वत को उठाकर अपनी उँगली पर थाम लिया|

"आप सब पहाड़ी के नीचे आ जाइए और बिल्कुल भी मत घबराइए! " कृष्ण ने कहा| लोगों के हृदय से भय दूर हो गया| वे गोवर्धन पर्वत के नीचे आराम से, प्रार्थना करते हुए चले गए| 

उन्होंने वहाँ सात दिन और सात रातें बिताईं, परंतु उन्हें इसका आभास भी नहीं हुआ| पहाड़ी के ऊपर क्या घटित हो रहा है, इससे अनभिज्ञ, वे सब परम आनंद में थे|

भगवान श्री कृष्ण ने किया सुदर्शन चक्र का आह्वान 

इंद्र ने भयंकर विद्युत आघातों से पहाड़ी पर बहुत से वार के प्रयास किए ताकि पहाड़ी नष्ट हो जाए और उसके नीचे के लोग वहीं समाप्त हो जाएँ| अंत में कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया, जो कि अत्यधिक ऊर्जा से युक्त चक्र की भाँति गतिशील था| 

वह शक्तिशाली अस्त्र अपनी तीव्रतम गति से घूमता हुआ पहाड़ी के ऊपर जाकर इंद्र के वज्र और अन्य देवताओं के अस्त्रों का इतनी तीव्रता से विनाश करने लगा कि कुछ तो अपने स्वामी पर आक्रमण करने उल्टा लौट पड़े|

इंद्र भौचक्के रह गए| उन्होंने अपनी सारी शक्ति लगा दी, परंतु लोगों को झुका पाने में असफल रहे|


जब इंद्र को भगवान विष्णु के रूप का ज्ञान हुआ (Jab Indra ko Bhagwan Vishnu ke Roop ka Gyan Hua)

अपनी पराजय के बाद इंद्र कुछ क्षण ध्यान किया| चूँकि वे देवता थे, अतः उन्हें ध्यान करने से पता चला कि यह छोटा बालक कौन था जिसने इंद्र के प्रकोप से लोगों की रक्षा की| 

अपनी अधीरता व क्रोधवश किए गए कार्यों के लिए उन्होंने पछताते हुए भगवान विष्णु से क्षमा याचना की, क्योंकि वे जान चुके थे कि ये स्वयं भगवान विष्णु ही थे जिन्होंने कृष्ण के रूप में जन्म लिया था|

सुखद दिन निकला और लोग अपने रक्षक के कहने पर अपने-अपने घर की ओर लौट गए| कृष्ण और इंद्र के बीच जो कुछ हुआ, उसका उन्हें जरा भी भान नहीं था| 
वे तो बस इतना जानते थे कि उनके नन्हें राजकुमार, उनकी आँखों के तारे के लिए कुछ भी असंभव नहीं था|




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