बादलों के ऊपर नाटक - श्री कृष्णा तृणावर्त लीला | Sri Krishna Trinavarta Leela

तृणावर्त लीला | Sri Krishna Trinavarta Leela
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श्री कृष्णा तृणावर्त लीला (Sri Krishna Trinavarta Leela): श्री कृष्णा ने राक्षसी पूतना का वध कर दिया था| पास से तथा दूर-दूर से सैकड़ों लोग उस भयंकर और प्रभावशाली दृश्य के साक्षी बनने आ रहे थे| राक्षसी पूतना का भयानक व दैत्याकार शरीर टूटी हुई दीवार और खंभे के मलबे के ऊपर फैला हुआ था| 

ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई पहाड़ी गलत घटनास्थन पर गिरी हुई हो| सभी हक्के-बक्के से खड़े थे| स्त्रियाँ अपने छोटे-छोटे बच्चों को दूर लेकर जा रही थीं, क्योंकि वे बच्चे इस अजीब दृश्य को देखकर रोने लगे थे|


वे, जिन्होंने उस राक्षसी को अत्यंत सुंदर, सभ्य और सौम्य स्वरुप में भवन में प्रवेश करते देखा था, उन्हें अपने नेत्रों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था| वे अचंभित थे, कैसे छलपूर्वक अपना रूप-रंग बदला जा सकता है? कैसे कपटपूर्ण मुस्कराहट के पीछे अपनी दुष्टता को छिपाया जा सकता है?

जैसे ही पूतना की मृत्यु का समाचार मथुरा तक फैला, कंस हैरान व भौचक्का खड़ा रह गया| पूतना बिजली के समान ताकतवर थी, इसके अलावा उसने अपने शरीर में जो विष इकट्ठा करके रखा हुआ था, वह इतना भयंकर था कि किसी दैत्य को भी तुरंत मृत्यु तक पहुँचा सकता था| फिर धरती पर स्थित एक साधारण नवजात शिशु कैसे उसकी मृत्यु का कारण बन सकता था?

वे दैत्य, जिन्हें नवजात शिशुओं कि हत्या करने का कार्य दिया गया था, वे बड़ी ही तीव्रता से अपने कार्य कर रहे थे| वे चुपचाप हर घर में घुसते और एक वर्ष से काम आयु का बच्चा देखते तो उसे उठा लाते| 

अधिकतर इस कार्य को चोरी-छिपे कर रहे थे| बच्चों के माता-पिता समझ नहीं पा रहे थे कि बच्चे कहाँ गायब हो रहे थे| यदि कोई माँ किसी दैत्याकार आकृति को अपना बच्चा उठाकर भागते हुए देखती भी तो वह मात्र चीख-चिल्ला पाती, जिससे दैत्य को कोई फर्क नहीं पड़ता| 

राक्षस को अच्छी तरह पता होता कि उसका पीछा करने वाले मनुष्यों को कैसे चकमा देना है|


सारे राज्य में भय के कारण विलाप का स्वर गूँज रहा था| इससे कंस को थोड़ी प्रसन्नता हुई| उसे यह विश्वास था कि उसका शत्रु जिस किसी भी घर में पल रहा होगा, इन बच्चों कि मृत्यु के साथ उन घरों की संख्या में भी कमी होती जाएगी|

परंतु उसकी प्रसन्नता अधिक समय तक स्थायी नहीं रही| नंद के घर में जन्म लेने वाले उस अद्भुत शिशु की सूचनाएँ उसे चिंतित कर रही थीं| वैसे वह स्वयं को समझा रहा था कि पूतना कि मृत्यु मात्र एक दुर्घटना ही थी- हो सकता है कि अपने शरीर में विष इकट्ठा करते समय उसने भूल से स्वयं ही उस विष का पान कर लिया हो|

कौन कह सकता है कि नंद का पुत्र वही नहीं है जिसके बारे में भयंकर भविष्यवाणी हुई थी? नंद, मथुरा राज्य के अधीन थे, परंतु अपने गाँव के मुखिया थे| अपने अधिकार क्षेत्र में एक राजा की ही तरह वे भी श्रेष्ठ, शक्तिशाली और लोकप्रिय थे| उनके पुत्र को उठाकर ले जाना कोई साधारण कार्य नहीं होगा| 

"यदि मैं दर्जनों की संख्या से बच्चों को मार रहा हूँ तो नंद के पुत्र को न मार पाने का कोई कारण ही नहीं है !" इस विचार से कंस ने स्वयं को समझाया |

अब तो गोपा में उत्सव को दुगुनी धूमधाम से मनाया जा रहा था| जब से लोग जान गए कि कैसे उनके नन्हें राजकुमार ने चमत्कारपूर्वक उस भयंकर राक्षसी को भेद खोला और स्वयं कि रक्षा की| 

तब भी, उस घटना से नंद और यशोदा के मन में बहुत बेचैनी थी| क्या पूतना स्वयं यहाँ आयी थी? या उसको किसी ने भेजा था? यदि वह स्वयं आई थी, तो अब उनका पुत्र उससे सुरक्षित था, परंतु यदि वह किसी अन्य द्वारा दिए गए कार्य को पूरा करने आई थी, तब?


निश्चय ही यह विश्वास करना बहुत कठिन था कि इस अबोध बालक का भी कोई शत्रु हो सकता था, जो अपनी एक झलक से ही लोगों का हृदय जीत लेता है| सारे लोग शिशु के चारों ओर स्नेह व् ममता से खड़े थे| 

नंद उन्हें बच्चे के लिए उत्पन्न प्रेम व् आनंद से वंचित करना नहीं चाहते थे| परंतु बच्चे कि सुरक्षा को कैसे सुनिश्चित किया जाए? 

थोड़ी देर के लिए इस प्रश्न ने उन दोनों माता पिता को चिंता में डाल दिया, परंतु अचानक ही नंद चमक उठे| "यदि यह बालक उस भयंकर पूतना से स्वयं कि रक्षा कर सकता है, तो निश्चिय ही, यह अन्य शत्रुओं से भी स्वयं की रक्षा कर लेगा !" उन्होंने अपनी पत्नी से कहा| यशोदा इस बात से पुनः आश्वस्त हुई|

उन दिनों बड़ी सुखद दोपहर थी| माता यशोदा अपने बच्चे को बगीचे में लेकर आईं| उनके साथ में दासियाँ भी थीं| ऊँचे-ऊँचे वृक्षों ने बाग को चारों ओर से दीवार की भाँति घेर रखा था| 

कोमल और मंद पवन उन वृक्षों की असंख्य शाखाओं से मिलकर मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही थी| सारा बगीचा सुगंधित पुष्पों और स्वादिष्ट फलों से लदा हुआ था| 


यशोदा की गोद में से कभी वह बालक अपने कोमल हाथों से कलियाँ तोड़ने का प्रयास करता, तो कभी चहचहाती चिड़ियाँ और उड़ती हुई तितलियाँ उसका ध्यान आकर्षित करतीं और वह मुस्कुरा देता|

देवी यशोदा और दासियों का पूरा ध्यान बालक पर था| वे समझ नहीं पाईं कि कैसे मौसम बदल रहा था| बड़ी जी जोरों से ठंडी हवा चलने लगी| 

सबका ध्यान आसमान पर तब पहुँचा जब उसका रंग कला होने लगा और हर ओर अंधकार छाने लगा| बादलों के बड़े-बड़े झुंड आसमान पर धीरे-धीरे छाने लगे, वृक्ष बड़े जोर-जोर से हिलने लगे|

"चलो जल्दी, सब वापस चलें," देवी यशोदा ने बच्चे को अपनी छाती से चिपकाते हुए कहा| अचानक ही धूल से भरी हुई आँधी आई और उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया| हर तरफ से उन्हें ऐसा भयंकर स्वर सुनाई दे रहा था मानो हजारों सर्प एक साथ फुंकार रहे हों !

एक प्रचंड बवंडर, अपने मार्ग में आने वाली सभी वस्तुओं को उड़ाता हुआ, चक्करदार तरीके से ऊपर कि ओर गति करता हुआ, सीधा उनकी तरफ बढ़ता आ रहा था|


"चलो, देवी यशोदा को चारों ओर से घेरकर सुरक्षा प्रदान करें !" प्रधान दासी ने कहा| 
तुरंत सभी दासियाँ उसकी आज्ञा का पालन करने लगीं| तभी उन्होंने जोर-जोर से रोने का स्वर सुना|

"हम सब यहीं हैं देवी, आपकी सेवा में !" उन्होंने यशोदा तक अपना स्वर पहुँचाने के लिए तीव्र स्वर में उत्तर दिया, परंतु वे कभी एक-दूसरे को देख नहीं पा रही थीं| 

बवंडर ऊपर आसमान की ओर चला गया| धूल के बदल छँटने लगे| तब दासियों ने देवी यशोदा के रोने का कारण समझा| उनकी गोद खाली थी| बच्चा नहीं था|

हैरान दासियाँ पूरे बगीचे में बच्चे को खोजने लगीं| परंतु वह कहीं नहीं दिखा| "चला गया ! मेरा बच्चा चला गया- बवंडर उसे अपने साथ उड़ा ले गया !" यशोदा जोर-जोर से रोने लगीं और घास पर निढाल होकर गिर पड़ी| 

दासियाँ समझ नहीं पा रही थीं कि उन्हें कैसे शांत कराएँ| दो दासियाँ उनके पास सुरक्षा हेतु बेजान सी बैठ गईं, जबकि अन्य अभी भी बालक कि खोज में लगीं हुई थीं|
बादलों के ऊपर एक घटना होने जा रही थी| 

बवंडर, जिसमे यशोदा की गोद से बच्चे को उठा लिया था, वह असाधारण बल से युक्त एक दैत्य था- उसमें बवंडर का रूप धर लेने की कला थी ! उसका नाम 'तृणावर्त' था और कंस ने उसे इसलिए भेजा था कि वह नंद के बच्चे को खींचकर ऊपर उठा ले और वहाँ से धरती पर नीचे फेंक दे- उसकी हत्या कर दे|


तृणावर्त ने ऐसा ही करने का प्रयास किया| वह तेजी से बच्चे को खींचकर ऊपर बादलों तब ले गया| परंतु वह बच्चा को फेंक नहीं पा रहा था| 
बच्चे ने उसे कसकर पकड़ लिया था| और वह अपने भयानक दैत्याकार स्वरुप को धारण करने के लिए बाध्य हो गया था|

दैत्य उस बच्चे से छुटकारा पाने का प्रयास करते हुए निराश हो गया, थक गया परंतु असफल ही रहा| बच्चे कि भुजाएँ दैत्य की गर्दन के चारों ओर कसती ही जा रही थीं|
अंत में तृणावर्त खीझ कर चीखने लगा| 

धरती पा लोग इस अजीब-सी बादलों की गड़गड़ाहट से डरे सूए थे| दैत्य का स्वर बादलों से होते हुए पहाड़ी से टकराया और सारे क्षेत्र में गूँज गया| अगले ही क्षण बच्चे ने दैत्य को धक्का दे दिया| दैत्य गाँव व नगर से दूर पहाड़ियों के बीचों-बीच जा गिरा और छिन्न-भिन्न हो गया|

बच्चा बादलों द्वारा धीरे-धीरे नीचे लाया गया और सीधा अपनी माता की गोद में रख दिया गया|
"आ गया- हमारी आँखों का तारा !" दासियाँ उत्साहित होकर बताने लगीं| और बच्चा रोने लगा- जैसे कि वह वायु और बादलों से दर गया हो !

देवी यशोदा ने अपनी आँखें खोली| वह शिशु को जोर से अपनी बाँहों में जकड़कर भवन के भीतर भागीं| पीछे-पीछे सभी दासियाँ भी चली गईं| 

सभी के मुख पर संतोष, आनंद भरी मुस्कान, साथ ही संदेह भी था कि यह सब कैसे संभव हुआ? 
परंतु यह तो हुआ- भले ही असंभव लगे !


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